स्वप्न नहीं यथार्थ था
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भविष्य वर्तमान की आँखों में तैर रहा था।
चाँद इधर-उधर दौड़ रहा था, तारे एक जगह ठहरे हुए थे।
धरती का पोर-पोर गहरी निद्रा में था-
पर भीतर कहीं भूकंप की तीव्रता बढ़ती जा रही थी।
तूफ़ान दसों दिशाओं को चीरता हुआ चीख रहा था।
दिशाओं की देह से टपकता लहू वे बार-बार आँचल में छुपा रही थीं।
इंसान की सदियों से जोड़ी ज़मीन,
और खरीदा हुआ आसमान-
धीरे-धीरे एक गड्ढे में धँसते जा रहे थे।
चेतन और अवचेतन के बीच
उसे घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही थी।
हवा में हाहाकार था,
रेत उसके दामन से छूट रही थी।
वृक्ष एक कोने में चुप खड़े थे-
अपनी गोद में सिमटे पशु-पक्षियों को थामे हुए,
और उनकी पत्तियाँ समय से पहले झर चुकी थीं।
सहसा-
स्वप्न का दृश्य टूटा।
उसने आँखें खोलीं।
खिड़की पर चाँद स्थिर था…
दौड़ नहीं रहा था।
उसने राहत की एक गहरी साँस ली।
पर तभी-
नग्न वृक्ष उसे घूरने लगे,
और सामने की सीमा भी…
अपलक।
देखते ही देखते
सीमा के सींग निकल आए-
और उनके भार से वह चीखने लगी।
वहाँ मनुष्य
चार पैर वाले प्राणी बन चुके थे,
हवा में अपनी-अपनी हदें गढ़ते हुए।
बच्चे भाषा भूल चुके थे-
गूँगे, बहरे।
समय अब भी
घटित घटनाओं का जायज़ा लेने में व्यस्त था।
‘मैं’ और ‘मेरे’ की भावना
आत्ममुग्धता को खूँटे से बाँधे
घसीटती चली जा रही थी।
उसने स्वयं से कहा-
“उठो…
तुम उठ क्यों नहीं रहे?
देखो… जीवन डूब रहा है…”
पर अर्द्धचेतना में झूलती उसकी चेतना
उसे और गहरे डुबोती रही।
वह चिल्लाया-
बहुत ज़ोर से चिल्लाया-
पर आवाज़ बाहर नहीं आई।
वह गूँगा हो चुका था।
हाँ-
गूँगा ही हो चुका था।
और तभी उसने देखा-
उसके मुँह में
अब जीभ नहीं थी।

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