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Saturday, 1 April 2023

विसर्जन


                   विसर्जन

….

“गणगौर का विसर्जन यहीं होता था…”

बुआ ने काई लगी बावड़ी की मुंडेर सहलाई।

“न जाने कितनी छोरियों के स्वप्न लील गई तू-

पानी हो या न हो… तुझमें ही पटक कर जाती थी।”

वह चुप हो गई।

उँगलियाँ पैरों के चाँदी के कड़ों पर ठहर गईं।

सुदर्शना ने धीमे से पूछा-

“छोरियाँ सपने नहीं देखती थीं क्या?”

बुआ ने एक गहरी साँस ली।

सूखी बावड़ी में झाँका-

“देखती थीं…”

“फिर?”

“डुबो देती थीं।”

सुदर्शना ठिठकी-

“स्वप्न… या गणगौर?”

बुआ की आँखें बावड़ी की गहराई में कहीं उतर गईं-

“स्वप्न।”


सीक्रेट फ़ाइल

         प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'लघुकथा डॉट कॉम' में मेरी लघुकथा 'सीक्रेट फ़ाइल' प्रकाशित हुई है। पत्रिका के संपादक-मंड...