विसर्जन
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“गणगौर का विसर्जन यहीं होता था…”
बुआ ने काई लगी बावड़ी की मुंडेर सहलाई।
“न जाने कितनी छोरियों के स्वप्न लील गई तू-
पानी हो या न हो… तुझमें ही पटक कर जाती थी।”
वह चुप हो गई।
उँगलियाँ पैरों के चाँदी के कड़ों पर ठहर गईं।
सुदर्शना ने धीमे से पूछा-
“छोरियाँ सपने नहीं देखती थीं क्या?”
बुआ ने एक गहरी साँस ली।
सूखी बावड़ी में झाँका-
“देखती थीं…”
“फिर?”
“डुबो देती थीं।”
सुदर्शना ठिठकी-
“स्वप्न… या गणगौर?”
बुआ की आँखें बावड़ी की गहराई में कहीं उतर गईं-
“स्वप्न।”

