मैं एक ब्लॉगर हूँ, स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हूँ, प्रकृति के निकट स्वयं को पाकर रचनाएँ लिखती हूँ, कविता भाव जगाएँ तो सार्थक है, अन्यथा कविता अपना मर्म तलाशती है |
प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'लघुकथा डॉट कॉम' में मेरी लघुकथा 'सीक्रेट फ़ाइल' प्रकाशित हुई है। पत्रिका के संपादक-मंड...
बहुत ही सुन्दर ताना बाना बुना है लघुकथा का
ReplyDeleteबेटी की शादी का माहौल परिवार जनों की हड़बड़ी
बूढ़ी दादी का ऐंठना ...टोकना...हल्दी की रश्म में खिलखिलाती औरतें...। मनमस्तिष्क में एक चित्र सा उभर आया है......
विधवा की छाँव शुभ कार्य में शोभा देती है क्या?"
सचमुच आज भी हमारा समाज इस अन्धविश्वास से बाहर नहीं निकल पाया....।
गोमती भाभी दर्दभरी मुस्कान बड़ी बहू को थमा जाती है एक अनुत्तरित प्रश्न के साथ फिर आने के वादे के साथ .
अन्त में टीस सी पैदा होती है इस दर्दभरी मुस्कान से...
लाजवाब लघुकथा ।
तहे दिल से आभार आदरणीय सुधा दीदी मनोबल बढ़ाने हेतु।स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।
Deleteसादर
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3743 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
ReplyDeleteधन्यवाद
दिलबागसिंह विर्क
सादर आभार आदरणीय सर चर्चामंच पर स्थान देने हेतु।
Deleteसादर
नमस्ते,
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 09 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
सादर आभार आदरणीय पाँच लिंकों पर स्थान देने हेतु।
Deleteसादर
सुन्दर लघु कथा।
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया सर
Deleteअभी कुछ कुप्रथाएं समाज में विद्यमान हैं एक नहीं कई सवालों के जवाब पूछती है आप की कथा
ReplyDeleteबहुत बढ़िया लघुकथा
सादर आभार आदरणीय मनोबल बढ़ाने हेतु।
Deleteसादर
बहुत कुछ सुधरना है अभी।
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया सर मनोबल बढ़ाने हेतु।
Deleteसादर
अनिता दी,आज भी हमारे समाज में विधवा नारी के साथ दुर्व्यवहार ही होता है इस बात को रेखांकित करती सुंदर लघुकथा।
ReplyDeleteतहे दिल से आभार ज्योति बहन यों ही साथ बनाए रखे।
Deleteसादर
वाह ! सुन्दर लघु कथा
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया सर मनोबल बढ़ाने हेतु।
Deleteसादर
बहुत सुंदर लघुकथा सखी 👌
ReplyDeleteतहे दिल से आभार बहना
Deleteबहुत ही संवेदनशील कथा अनीता जी, समाज आज भी ऐसी मानसिकता से नहीं उबर पा रहा है,
ReplyDeleteसादर आभार आदरणीय कामिनी दीदी
Deleteसदैव ही -औरतों ने ही औरतों का मान घटाया है | ये प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं कि एक नारी ही दूसरी को क्यों समझ नहीं पाती ?
ReplyDeleteआभारी हूँ आदरणीय रेणु दीदी यों ही साथ बनाए रखे।
Deleteसादर