प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'लघुकथा डॉट कॉम' में मेरी लघुकथा 'सीक्रेट फ़ाइल' प्रकाशित हुई है।
पत्रिका के संपादक-मंडल का सादर आभार।
आप भी पढ़िए मेरी लघुकथा:
https://www.laghukatha.com/
सीक्रेट फ़ाइल
…..
स्कूल-बस के इंतज़ार में खड़ी निधि रोज़ की तरह प्रभा के पास आ खड़ी हुई। धीमे स्वर में बोली-
“पता नहीं क्यों, आजकल रोज़ रात को बिजली चली जाती है… आपके यहाँ?”
माथे पर पड़े लाल निशान को उसने रुमाल से छुपाने की कोशिश की।
“हाँ… कभी-कभी,” प्रभा ने छोटा-सा उत्तर दिया।
“कभी कोहनी चौखट से टकरा जाती है, कभी पैर बेड से… उस दिन वाली चूड़ियाँ भी ऐसे ही टूट गई थीं।” निधि ने हँसने की कोशिश की, पर आवाज़ काँप गई।
बस अभी तक नहीं आई थी। भीड़ बढ़ने लगी थी।
“कुछ विषय ऐसे भी होते हैं जिनमें काम का बोझ ज़्यादा रहता है…” वह फिर बोली, जैसे बातों में कुछ दबा देना चाहती हो।
प्रभा चुप रही। उसकी आँखें निधि के गले पर पड़े नीले निशान पर टिक गईं।
“तुम बताओ… तुम कभी नहीं टकरातीं?” निधि ने दुपट्टा ठीक करते हुए पूछा।
“नहीं,” प्रभा ने शांत स्वर में कहा, “मैं बच्चों के साथ अकेली रहती हूँ।”
एक पल को निधि की आँखें स्थिर रह गईं। बस आ चुकी थी, पर उसे जैसे सुनाई नहीं दिया।

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार (27-04-2023) को "सारे जग को रौशनी, देता है आदित्य" (चर्चा अंक 4659) पर भी होगी।
ReplyDelete--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
ओह!!!
ReplyDeleteसच ये सच जिसे पूरा जीवन छुपाना चाहती हैं औरतें...ऐसे खुले तो क्या कहने...
बहुत ही हृदयस्पर्शी।
हृदयस्पर्शी !!
ReplyDeleteबेहद हृदयस्पर्शी
ReplyDelete