"महत्त्वाकांक्षाओं का ज्वार है।”
धैर्य ने समय की नब्ज़ टटोलते हुए कहा।
”नहीं! नहीं!! ज्वार नहीं ज्वर है। देखो! हो न हो यह कोरोना का क़हर है।"
नादानी तुतलाते हुए कहती है।
”अक्ल के अंधो देखो!
शब्दों को त्याग दिया है इसने
बेचैनियों की गिरफ़्त में कैसे तिलमिला रहा है!
लगता है प्रेम में है।”
धड़कन दौड़ती हुई आती है और समय का हाल बयाँ करती है।
”राजनितिक उथल-पुथल क्या कम सही है, समय सदमे में है।”
बुद्धि तर्क देते हुए अपना निर्णय सुनाती है।
धैर्य सभी का मुख ताकता है, कुछ नहीं कहता और चुपचाप वहाँ से चला जाता है।
"हुआ क्या? कुछ तो बताते जाओ।”
नादानी पीछे से आवाज़ लगाती है।
” कहा था ना! खुला मत छोड़ो स्वार्थ को, निगल गया विवेक को!”
कहते हुए धैर्य नज़रें झुकाए चला जाता है।
”परंतु ज्वर तो समय के है…!"
नादानी दबे स्वर में कहती है।
@अनीता सैनी 'दीप्ति'
