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Saturday, 7 August 2021

लोरी

           ”माँ बचपन में सुनाया करती थी वह लोरी सुनाओ ना।”

नंदनी ने अपनी माँ की गोद में सर रखते हुए कहा।

”मन बेचैन है लाडो?”

उसकी माँ ने स्नेह से पूछा।

”नहीं  ऐसा कुछ नहीं है।”

नंदनी ने अपनी माँ का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा।

”कुछ तुम्हारे ससुराल कुछ जवाई जी की भी कहो।”

नंदनी की माँ ने उसका सर सहलाते कहा।

”माँ लोरी सुना न।”

अनसुना करते हुए नंदनी छोटी बच्ची की तरह इठलाई।

” अच्छा सुन...। "

”ओढ़नी की बूँदी,लहरिए री लहर,बिंदी री चमक,पायल री खनक,मेरे पोमचे रो गोटो तू

 मान-सम्मान-स्वाभिमान है तू।”

उसकी माँ ने पोमचे के पल्लू से बेटी नंदनी का मुख ढकते हुए कहा।

पहले सावन मायके नंदनी अनेक उलझनों के साथ आई थी।

”माँ...।”

और नंदनी मौन हो गई।

” हूँ ...बोल! न लाडो।”

नंदनी की माँ ने उसके मुख से पल्लू हटाया।

”मैं तुम्हारे सर का ताज हूँ यह नहीं कहा। ब्याह के बाद बेटियाँ पराई हो जाती हैं?”

 नंदनी ने अपने आकुल मन को सुलाते हुए पूछा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


सीक्रेट फ़ाइल

         प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'लघुकथा डॉट कॉम' में मेरी लघुकथा 'सीक्रेट फ़ाइल' प्रकाशित हुई है। पत्रिका के संपादक-मंड...