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Wednesday, 9 March 2022

वज्राहत मन

          


                 ”अम्मा जी आपके साथ और कौन-कौन है?” कहते हुए नर्स ड्रिप बदलने लगती है।

”हाँ…हाँ… वे!” कहते हुए अम्मा जी टुकुर-टुकुर नर्स को घूरने लगती हैं ।अम्मा जी की स्मृति विस्तार पर प्रश्न वाचक का लोगो लगा हुआ था।नर्स डॉ. को जो जो सुनाना चाहती, वही उन्हें सुन जाता। दिखाई भी वही देता, नर्स डॉ. को जो जो दिखाना चाहती।

”अम्मा जी कुछ स्मरण हुआ ?” नर्स जाते-जाते यही शब्द फिर दोहराती है। अम्मा जी को कुछ याद आता है परंतु याद की तरह नहीं बल्कि छींक की तरह, उमड़ता है फिर चला जाता है । नर्स को फिर टुकुर-टुकुर देखने लगती है।

”बड़ी शांत और सुशील हैं अम्मा जी।”कहते हुए पाँच नंबर बैड का पेशेंट अम्मा जी के पास से गुजरता है।

"ओह! शांत और सुशील! " व्यंग्यात्मक स्वर में नर्स यही शब्द फिर दोहराती है। अम्मा जी को भी यही  सुनाई देता हैं।

”हाँ…हाँ…हाँ…शांत…सुशील… !” स्मृतियाँ अब अम्मा जी के बुखार की तरह धीरे-धीरे उमड़ती हैं। बहुत देर तक स्थाई रहती हैं। माथे पर ठंडे पानी से भीगी  पट्टी रखी जाती है। गहरी साँस के साथ चारों तरफ़ देखती हैं परंतु दिखता नहीं है।स्वयं के साथ संघर्ष कर आजीवन अर्जित किया ख़िताब अम्मा जी के होंठो पर फिर टहलने लगता हैं।

”शांत… सुशील…।”


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सीक्रेट फ़ाइल

         प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'लघुकथा डॉट कॉम' में मेरी लघुकथा 'सीक्रेट फ़ाइल' प्रकाशित हुई है। पत्रिका के संपादक-मंड...